राजधानी में चल रहे रायपुर साहित्य उत्सव में रविवार का दिन सिनेमा और संवेदनाओं के नाम रहा। श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में “नई पीढ़ी की फिल्मी दुनिया” विषय पर आयोजित सत्र में बॉलीवुड अभिनेता सत्यजीत दुबे ने शिरकत की। यह सत्र महज एक औपचारिक चर्चा नहीं, बल्कि सिनेमा के प्रति एक ईमानदार नजरिए का गवाह बना।
सत्यजीत दुबे ने मंच से स्पष्ट शब्दों में कहा, “सिनेमा चमक-दमक का खेल नहीं है। फिल्म की उम्र उसका बजट तय नहीं करता, बल्कि उसकी सच्चाई तय करती है। जो कहानी दिल तक पहुंचती है, वही समय के साथ चलती है।”
छत्तीसगढ़ की मिट्टी में है कहानियों का खजाना
मूल रूप से छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से ताल्लुक रखने वाले सत्यजीत ने अपनी जड़ों को याद करते हुए कहा कि यहां का लोकजीवन, साहित्य और सामाजिक अनुभव भारतीय सिनेमा के लिए वह आधार हैं, जिन पर टिकाऊ और यादगार फिल्में बन सकती हैं। उन्होंने कहा, “कहानियां हमारे चारों ओर हैं, उन्हें बस देखने और ईमानदारी से कहने की ज़रूरत है।”
ओटीटी प्लेटफॉर्म्स (OTT) के बढ़ते दौर पर उन्होंने इसे क्षेत्रीय आवाज़ों के लिए वरदान बताया। उनका मानना है कि आज का दर्शक परफेक्शन नहीं, बल्कि असली इंसान और जमीन से जुड़ी कहानियां देखना चाहता है।
बिलासपुर से मुंबई: संघर्ष से सफलता तक
सत्यजीत दुबे की कहानी युवाओं के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है। बिलासपुर में जन्म और स्कूली पढ़ाई के बाद, वे 2007 में आंखों में अभिनेता बनने का सपना लिए मुंबई पहुंचे। उन्होंने बताया कि थिएटर उनका पहला स्कूल बना, जिसने उन्हें अभिनय के साथ-साथ इंसान को समझना भी सिखाया।
शुरुआती संघर्ष के दिनों में उन्होंने विज्ञापनों के सहारे खुद को मुंबई में टिकाए रखा। पिज्जा हट, किटकैट और एचडीएफसी बैंक जैसे ब्रांड्स के विज्ञापन करने के बाद, महज़ 20 साल की उम्र में उन्हें शाहरुख खान के प्रोडक्शन की फिल्म ‘ऑलवेज कभी कभी’ से पहला ब्रेक मिला। इसके बाद ‘बांके की क्रेज़ी बारात’, ‘केरी ऑन कुट्टन’ और हाल ही में ‘मुंबई डायरीज 26/11’ में डॉक्टर अहान मिर्जा के किरदार ने उन्हें एक संजीदा अभिनेता के रूप में स्थापित किया।
“सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं”
सत्र के अंत में युवाओं को संदेश देते हुए सत्यजीत ने कहा कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। उन्होंने थिएटर के अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा, “अगर आप खुद से ईमानदार नहीं हैं, तो कोई किरदार भी ईमानदार नहीं हो सकता।”
कार्यक्रम में सुविज्ञा दुबे ने बच्चों के आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति पर परिवार की भूमिका पर प्रकाश डाला, जबकि अन्य वक्ताओं ने साहित्य और सिनेमा के बदलते रिश्तों पर अपने विचार रखे।
