कहते हैं कि अगर मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो कोई भी राह मुश्किल नहीं होती। बस्तर के जंगलों में कभी बंदूक थामकर हिंसा का रास्ता अपनाने वाले युवक-युवतियों ने आज इस कहावत को सच कर दिखाया है। शासन की ‘नक्सल पुनर्वास नीति-2025’ के तहत आत्मसमर्पण करने वाले 40 माओवादी अब समाज की मुख्यधारा में लौटकर आत्मनिर्भर बनने का सपना पूरा कर रहे हैं।
‘कौशलगढ़’ बना चौगेल कैंप
कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर विकासखंड के ग्राम चौगेल (मुल्ला) स्थित बीएसएफ कैंप का परिसर अब ‘कौशलगढ़’ में तब्दील हो चुका है। यहाँ 40 आत्मसमर्पित माओवादियों को उनकी रुचि के अनुसार अलग-अलग ट्रेड में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें शामिल हैं:
- ड्राइविंग और तकनीकी: फोर-व्हीलर ड्राइविंग और सहायक इलेक्ट्रिशियन।
- कला और हुनर: काष्ठशिल्प कला (Woodcraft) और सिलाई मशीन का प्रशिक्षण।
- शिक्षा: विशेष बात यह है कि जो लोग निरक्षर हैं, उन्हें कक्षा पहली से आठवीं तक की बुनियादी शिक्षा भी दी जा रही है।

बचपन के सपने हो रहे पूरे
प्रशिक्षण ले रहे 40 वर्षीय मनहेर तारम बताते हैं कि पिछले दो हफ्तों से वे ड्राइविंग सीख रहे हैं और उनका वर्षों पुराना शौक अब पूरा हो रहा है। वहीं, 19 साल की कु. काजल वेड़दा ने बताया कि उन्हें बचपन से कपड़े सिलने की इच्छा थी, जो इस कैंप में आकर पूरी हो रही है। इसी तरह सुकदू पद्दा और नरसिंह नेताम जैसे युवा भी अब अपने भविष्य को लेकर उत्साहित हैं।

सिर्फ काम नहीं, स्वास्थ्य और मनोरंजन का भी ख्याल
पुनर्वास कैंप के नोडल अधिकारी श्री विनोद अहिरवार ने बताया कि इन युवाओं को न केवल रोजगारमूलक प्रशिक्षण दिया जा रहा है, बल्कि उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जा रहा है।
- स्वास्थ्य विभाग की टीम नियमित जाँच करती है।
- मनोरंजन के लिए कैरम, संगीत (वाद्य यंत्र) और खेलों का आयोजन किया जाता है।

आने वाले समय की योजना
प्रशासन की योजना भविष्य में इन युवाओं को मशरूम उत्पादन और बागवानी जैसे स्वरोजगार मूलक कार्यों से जोड़ने की भी है। कलेक्टर उत्तर बस्तर कांकेर के मार्गदर्शन में चल रहे इस अभियान का उद्देश्य इन पूर्व माओवादियों को समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर प्रदान करना है।
