छत्तीसगढ़ की समृद्ध कला, संस्कृति और परंपराओं को अब रुपहले पर्दे पर एक नई और सशक्त पहचान मिलने जा रही है। संस्कृति एवं राजभाषा संचालनालय में छत्तीसगढ़ फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष सुश्री मोना सेन की अध्यक्षता में ‘स्क्रिप्ट समिति’ के गठन को लेकर एक उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की गई। इस पहल का मुख्य उद्देश्य राज्य में फिल्म निर्माण की गुणवत्ता में सुधार करना और स्थानीय विषयों को वैश्विक स्तर पर पहुँचाना है।
सिनेमा और संस्कृति का अनूठा समन्वय
बैठक में संस्कृति विभाग के संचालक श्री विवेक आचार्य ने इस बात पर जोर दिया कि सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति के संरक्षण का माध्यम भी है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की लोककथाओं, ऐतिहासिक प्रसंगों और यहाँ के जनजीवन पर आधारित फिल्मों को प्रोत्साहित करना समय की मांग है।
दिग्गज विशेषज्ञों ने साझा किए सुझाव
बैठक में कला और फिल्म जगत की बड़ी हस्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और महत्वपूर्ण सुझाव दिए:
- भगवान तिवारी (फिल्म अभिनेता, मुंबई): इन्होंने फिल्म निर्माण के व्यावहारिक पहलुओं और छत्तीसगढ़ में संभावनाओं पर प्रकाश डाला।
- प्रो. डॉ. राजन यादव (खैरागढ़ विश्वविद्यालय): कला और संगीत के अकादमिक समन्वय पर चर्चा की।
- पद्मश्री डॉ. राधेश्याम तारक (आकाशवाणी): लोक संस्कृति की बारीकियों को पटकथा में शामिल करने का सुझाव दिया।
- इनके अलावा ललित कला अकादमी के अभिमन्यु सिन्हा और दूरदर्शन के पी.के. पाठक ने भी अपनी विशेषज्ञता साझा की।
क्या होगा स्क्रिप्ट समिति का काम?
गठित होने वाली स्क्रिप्ट समिति मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित रहेगी:
- गुणवत्तापूर्ण चयन: छत्तीसगढ़ की परंपराओं और इतिहास पर आधारित सशक्त पटकथाओं का चुनाव करना।
- प्रतिभा को प्रोत्साहन: स्थानीय लेखकों, कलाकारों और तकनीकी विशेषज्ञों को एक मजबूत प्लेटफॉर्म प्रदान करना।
- वैश्विक पहचान: ऐसी फिल्मों के निर्माण में सहयोग करना जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदेश का नाम रोशन कर सकें।
मोना सेन का विजन
छत्तीसगढ़ फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष सुश्री मोना सेन ने कहा, “छत्तीसगढ़ में रचनात्मकता की कोई कमी नहीं है। स्क्रिप्ट समिति के माध्यम से हम स्थानीय प्रतिभाओं के लिए एक ऐसा ईकोसिस्टम तैयार करेंगे, जिससे छत्तीसगढ़ फिल्म उद्योग (Chhollywood) को एक नई दिशा और गति मिलेगी।”
इस बैठक को छत्तीसगढ़ के सिनेमाई इतिहास में एक मील का पत्थर माना जा रहा है, जिससे आने वाले समय में राज्य की सांस्कृतिक पहचान और भी व्यापक होगी।
