कहते हैं कि “कानून के हाथ लंबे होते हैं”, और छत्तीसगढ़ की राजनीति के सबसे रसूखदार परिवार के वारिस अमित जोगी के लिए यह कहावत आज हकीकत बन गई है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दो दशक पुराने रामावतार जग्गी हत्याकांड में निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए अमित जोगी की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है।
यह फैसला न केवल एक कानूनी जीत है, बल्कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में ‘अपराध और रसूख’ के गठजोड़ पर एक करारा प्रहार भी है।
वह रात, जिसने छत्तीसगढ़ की राजनीति को लहूलुहान कर दिया
तारीख थी 4 जून 2003। छत्तीसगढ़ राज्य अभी अपनी पहचान बना ही रहा था कि राजधानी रायपुर की सड़कों पर गोलियों की गूंज ने सबको दहला दिया। एनसीपी के बड़े नेता रामावतार जग्गी की उनके घर के पास सरेराह हत्या कर दी गई। यह महज एक मर्डर नहीं था, बल्कि राज्य का पहला हाई-प्रोफाइल राजनीतिक कत्ल था। आरोप सीधे तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी और उनके करीबियों पर लगे।
साजिश की परतें: सीबीआई की जांच और जोगी का घेराव
मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच सीबीआई को सौंपी गई। जांच में खुलासा हुआ कि यह हत्याकांड एक गहरी राजनीतिक साजिश का हिस्सा था।
- षड्यंत्र: राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में जग्गी को रास्ते से हटाने का प्लान बनाया गया।
- गवाह: सालों तक कोर्ट में गवाहों और सबूतों का खेल चलता रहा।
- निचली अदालत का फैसला: साल 2007 में विशेष अदालत ने अमित जोगी समेत 28 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट की मुहर: अब कोई रास्ता नहीं?
अमित जोगी लंबे समय से जमानत पर बाहर थे और अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे थे, लेकिन हाईकोर्ट के इस ताजा फैसले ने उनके राजनीतिक भविष्य पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। कोर्ट ने माना कि जग्गी की हत्या में साजिश के पुख्ता प्रमाण हैं और निचली अदालत द्वारा दी गई उम्रकैद (आजीवन कारावास) की सजा में किसी बदलाव की गुंजाइश नहीं है।
जग्गी परिवार का ‘अटल’ संघर्ष
इस पूरी कानूनी लड़ाई के नायक रहे रामावतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी। उन्होंने दो दशकों तक सत्ता और संसाधनों के खिलाफ अकेले जंग लड़ी। आज फैसले के बाद सतीश जग्गी ने कहा, “मेरे पिता को इंसाफ मिलने में 21 साल लग गए, लेकिन आज साबित हो गया कि अपराधी चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, न्याय से बच नहीं सकता।”
राजनीतिक गलियारों में हलचल
अमित जोगी को उम्रकैद की सजा बरकरार रहने से ‘जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़’ (JCCJ) के अस्तित्व पर भी संकट मंडराने लगा है। चुनावी साल के मुहाने पर खड़े राज्य के लिए यह खबर किसी राजनीतिक भूकंप से कम नहीं है।
