बस्तर के सुदूर वनांचलों में कभी पेंशन की चंद रुपयों के लिए बुजुर्गों को मीलों पैदल चलना पड़ता था, लेकिन आज डिजिटल इंडिया का असली चेहरा इन गाँवों की गलियों में ‘बीसी सखियों’ के रूप में मुस्कुरा रहा है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के सुशासन में तकनीक और सेवा के संगम ने ग्रामीणों की बेबसी को अब सुविधा में बदल दिया है।
बुजुर्गों के लिए सहारा बनीं दशोमती जैसी बेटियाँ
छिदगांव के वृद्ध हितग्राही रतन राम बघेल, जो चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ हैं, उनके लिए बीसी सखी दशोमती कश्यप किसी वरदान से कम नहीं हैं। रतन राम बताते हैं, “अब बैंक जाने की चिंता नहीं रहती, दशोमती बेटी हर महीने घर आकर पेंशन थमा जाती है।” यह कहानी अकेले रतन राम की नहीं, बल्कि बस्तर के उन तमाम बुजुर्गों की है जिन्हें अब बैंक की कतारों में नहीं लगना पड़ता।
आंकड़ों में नारी शक्ति का दमखम
जिले की 144 बीसी सखियों ने केवल फरवरी महीने में 4 करोड़ रुपये से अधिक का सफल ट्रांजैक्शन किया है। इसमें विशेष रूप से:
- मातृत्व वंदना योजना: ₹67 लाख से अधिक की राशि गर्भवती और धात्री माताओं तक पहुँचाई गई।
- अन्य सेवाएँ: नरेगा मजदूरी और वृद्धावस्था पेंशन का सुरक्षित भुगतान।
ब्लॉक स्तर पर शानदार प्रदर्शन
महिला सशक्तिकरण का सबसे प्रभावी उदाहरण दरभा, बस्तर, लोहंडीगुड़ा और तोकापाल जैसे ब्लॉकों में देखने को मिला है। यहाँ की बैंक सखियों ने न केवल वित्तीय प्रबंधन में कुशलता दिखाई, बल्कि हज़ारों ट्रांजैक्शन कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति दी है।
निष्कर्ष
यह केवल वित्तीय लेन-देन की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उन 144 महिलाओं के आत्मविश्वास की गाथा है जो आज आत्मनिर्भर होकर गाँव के विकास का नेतृत्व कर रही हैं। बस्तर की इन बेटियों ने साबित कर दिया है कि तकनीक जब संवेदना के साथ मिलती है, तो वह वास्तव में जनहितकारी सुशासन की नींव बनती है।
