जशपुर: ‘सबसे दूर, सबसे पहले’… जब पहाड़ी कोरवाओं के दरवाजे पर चलकर पहुंची सरकार, ‘जनजातीय गरिमा उत्सव’ में संवरा ग्रामीणों का भविष्य

जशपुर, 23 मई 2026। सुदूर वनांचलों में रहने वाले ग्रामीणों और विशेष पिछड़ी जनजातियों के लिए सरकारी दफ्तरों तक पहुंचना अक्सर एक मुश्किल सफर होता है। लेकिन क्या हो जब सरकार खुद चलकर उन पगडंडियों को पार करते हुए उनके दरवाजे तक पहुंच जाए? जशपुर जिले में शनिवार को कुछ ऐसा ही सुखद और सकारात्मक नजारा देखने को मिला।

​भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय के निर्देशानुसार जशपुर में “जनजातीय गरिमा उत्सव 2026” के तहत जन भागीदारी अभियान की शुरुआत की गई है। इसका मुख्य ध्येय वाक्य है— “सबसे दूर, सबसे पहले”। इस भावना को चरितार्थ करते हुए प्रशासन ने जिले के ग्राम खूंटीटोली, कमतरा, पाकरगांव और अन्य सुदूर गांवों में विशेष समाधान और जागरूकता शिविरों का आयोजन किया।

पहाड़ी कोरवाओं के जीवन को आसान बनाने की पहल

​इन शिविरों का मुख्य केंद्र बिंदु विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) ‘पहाड़ी कोरवा’ और सुदूर अंचल के वे ग्रामीण रहे, जो अक्सर सूचनाओं के अभाव में विकास की मुख्यधारा से कट जाते हैं। शिविर में पहुंचे अधिकारियों ने पूरी आत्मीयता के साथ ग्रामीणों के बीच बैठकर उन्हें केंद्र और राज्य शासन की उन तमाम कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी दी, जो उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए ही बनाई गई हैं।

स्वास्थ्य, पहचान और सुरक्षा: एक ही छत के नीचे

​एक आम ग्रामीण के लिए अपने जरूरी दस्तावेज बनवाना किसी चुनौती से कम नहीं होता। प्रशासन ने इस दर्द को समझा और शिविर में ही सारी व्यवस्थाएं उपलब्ध कराईं:

  • सेहत की फिक्र: चिकित्सा दलों द्वारा शिविर में आए सभी बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों का मौके पर ही निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण किया गया।
  • पहचान और दस्तावेज: ग्रामीणों की सहूलियत के लिए आधार (Aadhaar) अपडेट करने के साथ-साथ आय, जाति और निवास प्रमाण पत्रों के ऑनलाइन आवेदन मौके पर ही भरवाए गए।
  • स्वास्थ्य सुरक्षा की गारंटी: ग्रामीणों को गंभीर बीमारियों के इलाज में आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े, इसके लिए उनके ‘आयुष्मान कार्ड’ भी बनाए गए।

समस्याओं का तत्काल समाधान

​अधिकारियों ने केवल मंच से भाषण नहीं दिया, बल्कि ग्रामीणों की व्यक्तिगत और सामुदायिक समस्याओं को सुना। पेंशन, राशन और अन्य मूलभूत सुविधाओं से जुड़ी ग्रामीणों की कई शिकायतों का शिविर में ही तत्काल निराकरण कर उन्हें राहत पहुंचाई गई।

​’जनजातीय गरिमा उत्सव’ का यह आयोजन केवल एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि आदिवासियों और प्रशासन के बीच टूटते संवाद को फिर से जोड़ने की एक मानवीय पहल है। जब अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक सरकार पहुंचती है, तभी सही मायनों में ‘जन भागीदारी’ और ‘गरिमा’ का उत्सव सार्थक होता है।

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