जशपुर/बगीचा, 23 मई 2026। प्रशासन जब खुद चलकर ग्रामीणों के बीच पहुंचता है, तो बरसों से लंबित शिकायतें उम्मीदों में बदल जाती हैं। जशपुर जिले में चल रहे ‘सुशासन तिहार’ के तहत कुछ ऐसा ही बदलाव बगीचा विकास खंड के दूरस्थ ग्राम टांगरडीह में देखने को मिला। यहाँ आयोजित जिला स्तरीय जनसमस्या निवारण शिविर में केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी नहीं हुईं, बल्कि ग्रामीणों के चेहरे पर राहत की मुस्कान भी तैर उठी।
जशपुर जिले के सभी 8 विकास खंडों में शासन के निर्देशानुसार इन विशेष शिविरों का आयोजन किया जा रहा है। इसी कड़ी में बीते दिन, 22 मई को टांगरडीह में जिला स्तरीय शिविर लगाया गया, जहाँ अधिकारियों ने पूरी संवेदनशीलता के साथ ग्रामीणों के सुख-दुख और समस्याओं को सुना।
किसानों के हाथों में सौंपी ‘समृद्धि और हरियाली’
शिविर का सबसे खूबसूरत नजारा तब देखने को मिला जब अंचल के अन्नदाताओं को सशक्त बनाने की पहल की गई। कार्यक्रम में:
- आर्थिक संबल: 25 स्थानीय किसानों को उनके हक की ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ (किसान किताब) सौंपी गई, ताकि उन्हें खेती-किसानी के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।
- हरियाली से खुशहाली: इसके साथ ही 25 किसानों को आम, लीची और अमरूद जैसी उन्नत किस्मों के फलदार पौधे वितरित किए गए। यह वितरण केवल पौधों का नहीं था, बल्कि किसानों के आशियाने में भविष्य की मीठी आय और हरियाली बोने की एक सुंदर कोशिश थी।
उम्मीद लेकर आए ग्रामीण, मौके पर ही मिली राहत
बगीचा जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) श्री विनोद सिंह ने बताया कि इस शिविर को लेकर ग्रामीणों में जबरदस्त उत्साह था। शिविर में कुल 444 आवेदन प्राप्त हुए, जो इस बात का प्रमाण हैं कि ग्रामीण प्रशासन पर कितना भरोसा करते हैं।
अधिकारियों की तत्परता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्राप्त आवेदनों में से 143 आवेदनों का मौके पर ही तात्कालिक निराकरण कर दिया गया। जिन ग्रामीणों के काम बरसों से रुके थे, वे जब दफ्तरों के चक्कर काटे बिना सीधे समाधान पाकर लौटे, तो उनकी खुशी देखने लायक थी।
शेष समस्याओं पर भी गंभीरता से होगा काम
जनपद सीईओ ने ग्रामीणों को आश्वस्त करते हुए कहा कि जिन शेष आवेदनों का निपटारा मौके पर नहीं हो पाया है, उन्हें पूरी गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ समय-सीमा के भीतर हल किया जाएगा। प्रशासन का संकल्प है कि अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को भी सुशासन का सीधा लाभ मिले।
टांगरडीह का यह शिविर यह साबित करता है कि जब नियम और नीतियां जनता के प्रति संवेदनशील हो जाती हैं, तो सुशासन का त्योहार सही मायनों में लोक-उत्सव बन जाता है।
