बस्तर का ‘मांझीपाल’ बना देश-विदेश के पर्यटकों की पहली पसंद, ‘आमचो लाड़ी’ होमस्टे और बैम्बू राफ्टिंग का रोमांच जीत रहा दिल

बस्तर सिर्फ अपने घने जंगलों और लाल मिट्टी के लिए ही नहीं, बल्कि अब अपने तेजी से उभरते इको-टूरिज्म (Eco-Tourism) के लिए भी देश-दुनिया में चमक रहा है। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान (Kanger Valley National Park) के बीच बसा एक छोटा सा खूबसूरत गांव, ‘मांझीपाल’, इन दिनों प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है। प्रकृति की असीम शांति, साफ बहती कांगेर नदी और जनजातीय समाज की सादगी ने इस जगह को छत्तीसगढ़ पर्यटन का नया ‘हॉटस्पॉट’ बना दिया है।

‘आमचो लाड़ी’ होमस्टे: रजनीश पणिकर की पहल से बस्तर की संस्कृति को मिला नया आयाम

​मांझीपाल की इस कामयाबी और यहां उमड़ती पर्यटकों की भीड़ के पीछे एक बड़ी वजह यहां का अनूठा होमस्टे है। यहां स्थित ‘आमचो लाड़ी’ (Aamcho Laadi) होमस्टे आज सिर्फ ठहरने की एक जगह नहीं, बल्कि बस्तरिया संस्कृति को करीब से महसूस करने का सबसे बेहतरीन जरिया बन गया है। इस शानदार होमस्टे के संचालक (Owner) रजनीश पणिकर ने इसे इस तरह से सहेजा और डिजाइन किया है कि यहां आने वाला हर मेहमान खुद को प्रकृति और स्थानीय परंपराओं के रंग में रंगा हुआ पाता है।

​विदेशी मेहमानों के बीच भी ‘आमचो लाड़ी’ का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। रजनीश पणिकर और उनकी टीम की आत्मीय मेजबानी, मिट्टी और बांस से बने घर का पारंपरिक परिवेश और असली बस्तरिया व्यंजनों का सोंधा स्वाद—यह सब मिलकर पर्यटकों को एक ऐसा अनुभव देते हैं, जो शहरों के बड़े फाइव-स्टार होटलों में भी मयस्सर नहीं है। यहां आकर लोग डिजिटल दुनिया की भागदौड़ से कटकर बर्ड वॉचिंग (पक्षी अवलोकन) करते हैं और गांव के असली सुकून को जीते हैं।

कांगेर नदी की शांत जलधारा और बैम्बू राफ्टिंग का अद्भुत रोमांच

​मांझीपाल की एक और सबसे बड़ी खासियत है कांगेर नदी का निर्मल जल। इस नदी में स्थानीय आदिवासियों द्वारा तैयार की गई पारंपरिक बांस की नावों पर होने वाली ‘बैम्बू राफ्टिंग’ (Bamboo Rafting) सैलानियों के लिए एक अलग ही लेवल का रोमांच है। जब सैलानी घने हरियाली वाले जंगलों के बीच से बहती नदी में राफ्टिंग करते हैं, तो दुर्लभ पक्षियों की चहचहाहट और पानी की कलकल के बीच बस्तर की खूबसूरती दिल में उतर जाती है।

पलायन पर लगी रोक, स्थानीय युवाओं को मिल रहा रोजगार

​मांझीपाल का यह कम्युनिटी-बेस्ड टूरिज्म (सामुदायिक पर्यटन) मॉडल सिर्फ सैर-सपाटे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय आदिवासी समाज के लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं हो रहा। पर्यटन हब के रूप में विकसित होने से गांव के युवाओं को अब शहरों की तरफ पलायन नहीं करना पड़ रहा है। उन्हें अब घर बैठे प्रोफेशनल टूरिस्ट गाइड, राफ्टिंग संचालक, होमस्टे मैनेजमेंट और हैंडीक्राफ्ट (हस्तशिल्प) बिक्री के जरिए स्थायी रोजगार मिल रहा है।

कैसे पहुँचें मांझीपाल?

​प्रकृति के इस स्वर्ग तक पहुंचना पर्यटकों के लिए बेहद सुगम है:

  • दूरी: मांझीपाल, जिला मुख्यालय जगदलपुर से मात्र 35 से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
  • सड़क मार्ग: जगदलपुर से दरभा मार्ग होते हुए बेहतरीन पक्की सड़क के जरिए अपनी निजी गाड़ी या स्थानीय टैक्सी से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।
  • रेलवे/हवाई मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट जगदलपुर में ही स्थित है, जिससे देश के किसी भी कोने से यहां आना बहुत सुविधाजनक हो गया है।

​बदलते बस्तर की यह नई तस्वीर साबित करती है कि अगर प्रकृति और संस्कृति को सहेजते हुए पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए, तो वह विकास का सबसे शानदार मॉडल बन सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *